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ब्रज में गोपी बने त्रिपुरारी ( गोपेश्वर महादेव )

02 Aug, 2024 by Vedic Remedies

श्रीमद गोपीश्वरम वन्दे शंकरं करुणामय
सर्वक्लेश हरं देवं वृन्दारण्य रतिप्रदम्

जब-जब भगवान ने अवतार लिया, तब-तब भगवान शंकर उनके बालरूप के दर्शन करने के लिए पृथ्वी पर पधारे। श्री रामावतार के समय भगवान शंकर श्री काकभिशुण्डि के साथ वृद्ध ज्योतिषियों के रूप में, काकभिशुण्डि जी को बालक बनकर श्रीधाम अयोध्या में पधारे और रनिवास में प्रवेश कर भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघन के दर्शन किये।

औरौ एक कहौ निज च च री, सुनु गिरिजा अति द्रध मति तोरी
काकभिशुण्डि संग हम दोउ, मनुजरूप जानहिं  नहिं कोउ

श्रीकृष्णावतार के समय बाबा भोलेनाथ साधु के वेश में गोकुल पधारे, वेश देखकर यशोदाजी ने दर्शन नहीं कराए तो धूनी द्वार पर लगा दी। लल्ला रोने लगे और उन्हें नज़र लग गयी। बाबा भोलेनाथ ने नजर उतारी, गोद में लेकर आंगन में नाचने लगे। आज भी नंदगांव में नदेश्वर के नाम से विराजमान हैं । ऐसे ही भगवान शंकर ने समय-समय पर अलग-अलग रूप धारण कर अपने प्रिय आराध्य की लीलाओं का दिग्दर्शन किया। वृन्दावन में भगवान शंकर के विचित्र रूप में दर्शन होते हैं। वृदावन में भगवान श्री कृष्ण ने वंशीवट पर महारास किया था, जिसे देखने के लिए भगवान शंकर को गोपी बनना पड़ा। वृन्दावन नित्य है, रास नित्य है, आज भी रास होता है, श्री गोपीश्वर महादेव नित्य है, रास देख रहे हैं।

एक बार शरदपूर्णिमा की शरद उज्ज्वल चांदनी में वंशीवट पार यमुना के किनारे मनमोहन श्यामसुंदर साक्षात मन्मथनाथ वंशी बज उठी। श्रीकृष्ण ने 6 महीने की एक रात करके महारास किया। मनमोहन की मीठी मुरली ने कैलाश पर विराजमान भगवान शंकर की भी मन मोह लिया और समाधि भंग हो गई । बाबा बावरे से चल पड़े बृज वृन्दावन की ओर, माँ पार्वती जी मनाकर हार गयीं लेकिन त्रिपुरारी नहीं माने। भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त श्री आसुरि मुनि, पार्वतीजी, नंदीजी, श्रीगणेशजी, और श्री कार्तिकेय के साथ भगवान शंकर वृन्दावन के वंशितत पर आ गए, जहाँ महारास हो रहा था, वहाँ गोलोक वासिनियाँ गोपियाँ द्वार पर खड़ी हुई थीं। माँ पार्वती तो महारास में प्रवेश कर गई, परंतु गोपियों ने महादेव और श्री आसुरि मुनि को अंदर जाने से रोक दिया और बोली यहां भगवान श्रीकृष्ण के अतिरिक्त कोई अन्य पुरुष इस एकांत महारास में प्रवेश नहीं कर सकता ।तब भगवान शकर बोले देवियों हमें भी महारास और श्री राधा कृष्ण के दर्शन की लालसा ही, अत: आप ही कोई उपाय बतायें जिसे हम महारास का दर्शन करा सकें। ललिता सखी बोली कि यदि आप महारास देखना चाहते हैं तो गोपी बन जाइये। मानसरोवर में स्नान करके गोपी का रूप धारण कर आप महारास में आ सकते हैं। फिर क्या था भगवान शिव ने अर्धनारीश्वर से पूरी नारी का रूप धारण कर लिया। श्री यमुनाजी ने षोडश संस्कार कर दिया, तब भोले बाबा गोपी रूप हो गए और प्रसन्न मन से महारास में प्रवेश कर गए। नटवर वेशधारी, श्री रासबिहारी राजेश्वरी रसमई श्री राधिकाजी एवं गोपियों को नृत्य एवं रास करते हुए नटराज भोलेनाथ भी स्वयं ता था थैया कर नाच उठे। मनमोहन ने ऐसी वंशी बजाई कि भोलेनाथ अपनी सुधि बुद्धि खो बैठे, बनवारी से क्या छुपा हाय, भोलेनाथ को पहचान लिया और मुस्कुरा उठे। उन्हें राजेश्वरी श्रीराधाजी और गोपियों को छोड़कर बृजवाणीतों और लतायों के बीच में गोपीरूप गोपीनाथ का हाथ पकड़ लिया और मंद-मंद मुस्कुराते हुए बोले आइए प्रभु इस महारास में आपका स्वागत है महाराज गोपेश्वर।

श्रीराधा गोपेश्वर महादेव के मोहिनी गोपी वेशरूप को देखकर आशचर्य में पड़ गई, तब श्री कृष्ण ने कहा कि राधे ये कोई गोपी नहीं, ये तो साक्षात देवों के देव महादेव भगवान शंकर हैं, जिनके हमारे महारास के दर्शन करने के लिए गोपी रूप धरण किया हैं । राधा कृष्ण ने शिवजी से पूछा कि आपने गोपी वेश क्यों बनाया है, तो शंकरजी बोले प्रभु आपकी इस दिव्य रसमई प्रेमलीला महारास को देखने के लिए ही गोपी रूप लिया है, इस पर प्रसन्न होकर राधा जी महादेव से वर मांगने के लिए कहा, महादेवजी को ने कहा कि हम चाहते हैं कि हमारा आप दोनों के चरण कमलो में सदैव वृन्दावन में निवास हो। आप दोनों के चरण कमलो के बिना हम कहीं निवास नहीं करना चाहते, श्रीकृष्ण ने तथास्तु कहकर कालिंदी के निकट निकुंज के पास वंशीवट के सम्मुख महादेवजी को गोपेश्वर महादेव के नाम से स्थापित कर विराजमान कर दिया। श्रीकृष्ण गोपी गोपो ने उनकी पूजा की और कहा कि बृज वृन्दावन की यात्रा तभी पूर्ण होगी, जब वह आपके दर्शन कर लेगा। आपके दर्शन के बिना यात्रा अधूरी मानी जाएगी।

भगवान शंकर वृन्दावन में आज भी गोपेश्वर महादेव के रूप में विराजमान हैं और अपने भक्तों को दिव्य गोपी वेश में दर्शन दे रहे हैं। गर्भ गृह के बाहर पार्वती माँ, श्री गणेश, श्री नंदी विराजमान हैं, आज भी संध्या के समय भगवान का गोपी वेश में श्रृंगार होता हैं।

श्री गोपेश्वर महादेव को श्रीधाम वृन्दावन का कोतवाल कहा जाता हैं।